मां के गर्भ में बच्चा क्या सोचता है ? child think in the mother’s womb

मां के गर्भ में बच्चा क्या सोचता है ?

मां के गर्भ में बच्चा क्या सोचता है ?

गरुड़ पुराण में जीवन, मृत्यु, स्वर्ग नरक, पाप पुण्य, मोक्ष पाने के साथ-साथ यह भी बताया गया है. कि 9 महीने तक मां के गर्भ में बच्चा क्या क्या सोचता है. और मां के गर्भ में शिशु का किस प्रकार विकास होता है.

भविष्य पुराण में साफ-साफ बताया गया है कि मां के गर्भ धारण करने के 50 दिन बाद उसमें अंकुर निकलने लग जाते हैं. पहले महीने में गर्दन, सर, कंधे और पेट और पेट की हड्डियों की माला बनने लगती हैं. 4 महीने में उस अंकुर के भाग में उंगली बन जाती है. और पांचवे महीने में मुख्य, नाथ, जीव, और कान बनने लगते हैं. सातवें महीने में गुर्दा, योनि और नाभि बन जाती है. और आठवें महीने में सभी अंग पूर्ण रूप से तैयार हो जाते हैं. और सर में बाल आ जाते हैं.

भविष्य पुराण में इसके आगे बताया गया है कि मां भोजन के रूप में जो भी खाती है. उस भोजन का रस नाभि के जरिए शिशु के शरीर में पहुंचता है. लेकिन दोस्तों यह सभी बातें तो आप पहले से ही जानते होंगे. लेकिन पुराण में आगे यह बताया गया है कि शिशु जब घर में होता है. तब वह हर सुख दुख को भली-भांति समझता है. इतना ही नहीं बल्कि शिशु को मां के गर्भ में अपना पुराना जन्म भी याद रहता है. उसे यह भी याद होता है कि वह पिछले जन्म में क्या था. उसे याद रहता है कि पिछले जन्म में उसके साथ क्या-क्या घटा था. और उसे याद रहता है कि पिछले जन्म में उसकी मृत्यु कैसे और कब क्यों हुई थी.

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भविष्य पुराण में आगे यह बताया गया है कि शिशु उस समय यह सोचता है कि मैंने अनेकों योनियों में जन्म लिया है. और बार-बार मुझे मरना पड़ा. उसके बाद फिर शिशु यह सोचता है कि इस बार गर्भ से बाहर आने के बाद उसे दोबारा संसार के बंदरों से बंधना पड़ेगा. और फिर दोबारा मृत्यु को प्राप्त होना होगा.

इसके बाद भविष्य पुराण मैं यह कहता है कि जितना कष्ट पर्वत के नीचे दब जाने से किसी मनुष्य होता है. उतना ही दर्द गर्भ में पल रहे शिशु को भी होता है. समुद्र में डूबने का जो दुख होता है. वही दुख गर्भ में पल रहा शिशु भी महसूस करता है. सूल से बांधने पर जो मनुष्य का हाल होता है. उससे भी 8 गुना ज्यादा गर्भ में कष्ट महसूस होता है.

इसके बाद यह बताया गया है कि इन सभी दुखों के अलावा सबसे ज्यादा दुखी तब होता है. जब शिशु जन्म लेता है. क्योंकि शिशु के जन्म लेते ही जब उसे बाहर की हवा लगती है. तब फिर वह अपने पुराने जन्मों को भूल जाता है. वह अपने अस्तित्व और ईश्वर को भी याद नहीं रख पाता. यही कारण है कि गर्व से बाहर आते ही बच्चा जोर जोर से रोना शुरू कर देता है. और वह समझ ही नहीं पाता कि वह कहां पर था और अब कहां आ गया है.

भविष्य पुराण में यह भी बताया गया है कि गर्भ के अंदर और गर्भ से बाहर आते समय बच्चे को जो भी पीड़ा होती है. उसके सामने यह संसार की पीड़ा कुछ भी नहीं है.

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