ऐसे भी पूजा होती भारत देश में || kamakhya temple secrets in india

Kamakhya temple secrets in India

हमारे देश में योनि की पूजा भी की जाती है. लेकिन दोस्तों आपको यह नहीं पता होगा कि आखिर क्यों की जाती है इसकी पूजा. इसकी पूजा करने से क्या मिलता है लोगों को कि वह इसकी पूजा करते वक्त जरा सा भी झिझक ते नहीं हैं. लेकिन दोस्तों यह पूजा क्यों की जाती है, यह तो आपको किसी ने बताया ही नहीं होगा. आज हम आपको इस पूजा को करने का कारण, इस पूजा की महत्वता और इसके पीछे छुपे राज बताने वाले हैं.
हमारे भारत देश की एक अलग संस्कृति और धार्मिक विचारधाराओं के कारण हमारे देश में अलग-अलग तरह के मंदिर पाए जाते हैं. इन मंदिरों की भी अपनी अलग अलग संस्कृति और अलग-अलग पौराणिक कथाएं हैं. हमारे देश के सभी मंदिरों में अलग-अलग ढंग से पूजा की जाती है. और इसके अलावा हमारे देश में अलग-अलग तरह के पेड़ पौधे, जानवर, और करोड़ों देवी देवताओं की भी पूजा की जाती है. लेकिन दोस्तों इस पूजा को माता कामाख्या देवी मंदिर में किया जाता है. कामाख्या मंदिर सभी पीठों का महापीठ माना जाता है.

आसाम की राजधानी दिसपुर से भी लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित नीलांचल पर्वत से यह शक्तिपीठ 10 किलोमीटर दूर है. यह शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से बहुत ही चमत्कारी और शक्तिशाली है. कामाख्या देवी का मंदिर अघोरियों और तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है. इस मंदिर में आपको मां अंबे की कोई मूर्ति या कोई चित्र दिखाई नहीं देगा. बल्कि यहां पर एक कुंड बना हुआ है. और इस चमत्कारी कुंड से जल हमेशा बहता ही रहता है. और यहीं पर माता की योनि की पूजा की जाती है. योनि भाग यहां पर होने की वजह से माता रजस्वला भी होती हैं.
पुराणों के अनुसार माना जाता है कि इस शक्तिपीठ का नाम कामाख्या इसलिए पड़ा क्योकि इस जगह पर भगवान शिव का माता पार्वती के प्रति मोह भंग करने के लिए विष्णु भगवान ने अपने चक्कर से माता सती के 51 भाग किए थे. जिस जगह पर भी यह भाग गिरे थे. वहां पर शक्तिपीठ बन गया. और इस मंदिर में माता का योनि भाग गिरा था. जो कि यहां पर बहुत शक्तिशाली पीठ है. वैसे तो यहां पर माता के भगत हर साल आते जाते ही रहते हैं. लेकिन दुर्गा पूजा, बसंती पूजा, अंबुबाची और मनासा पूजा, इन पूजाओ की अपनी एक अलग ही महत्वता है. जिसके कारण लाखों की संख्या में यहां पर भगत माता की पूजा करने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं.


यहां पर अंबुबाची के दौरान पास में स्थित ब्रह्मपुत्र का पानी 3 दिन के लिए लाल हो जाता है. और ऐसा कहा जाता है की नदी का यह लाल रंग माता के मासिक धर्म के कारण होता है. 3 दिन के बाद यहां पर भक्तों की भीड़ लग जाती है. दोस्तों आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में लाल रंग का कपड़ा दिया जाता है. कहा जाता है कि जब मां को 3 दिन का राजेशवला होता है. तो मंदिर के अंदर सफेद रंग का कपड़ा बिछा दिया जाता है. और 3 दिन के बाद जब मंदिर के दरवाजे को खोला जाता है. तो वह सफेद कपड़ा माता के रक्त से लाल हो चुका होता है. इस कपड़े को अंबुबाची वस्त्र भी कहा जाता है. और इसी को भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है.
यहां पर भक्त अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए कन्या पूजन और भंडारा भी करवाते हैं. इस भंडारे में यहां पर पशुओं की बलि दी जाती है. लेकिन यहां पर मादा जानवरों की बलि नहीं दी जा सकती. इस मंदिर में जो भी भगत अपनी मुराद लेकर आता है, उसकी हर मुराद पूरी हो जाती है. लेकिन दोस्तों भगत अपनी मुराद पूरी करने के लिए इन सारी पूजाओं से काफी अलग और एक अजीब किस्म की पूजा करते हैं. जिसे की योनि पूजा कहा जाता है. पूजा को बहुत ही शक्तिशाली पूजा माना जाता है.
इस पूजा को संस्कृति भाषा में कलवाना पूजा भी कहा जाता है. इस पूजा में एक स्त्री को माता सती के स्वरूप मानकर उनके 51 महाशक्ति पीठों के तौर पर सभी अंगों की पूजा की जाती है. कलवाना पूजा बहुत ही शक्तिशाली पूजा है. इस पूजा को करने से प्रकृति के सभी तत्वों की पॉजिटिव एनर्जी और अच्छी ऊर्जा प्राप्त होती है. इस पूजा को मेडिटेशन के रूप में भी किया जाता है. इस पूजा को करने से शरीर के 7 चक्ररो में से 6 चक्कर उजागर हो जाते हैं. दोस्तों कलवाना शब्द का अर्थ यह है कि इसमें जो काला शब्द है उसका अर्थ है प्राकृतिक का भाग. और वाहन का अर्थ है प्रकृति को निमंत्रण. जिसका अर्थ यह हुआ कि प्रकृति के भाग का निमंत्रण. इसको एक पवित्र अनुष्ठान माना गया है. यह प्राकृतिक मां की शक्ति को जागरूकता के माध्यम से शरीर में ला देती है. इस पूजा से श्री चक्र पूजा का भी लाभ मिलता है. इस पूजा में निजी अंगों को स्पर्श करके दिव्य ऊर्जाऔ को सरीर में स्थान मिल जाता है. फिर उसके बाद स्नान करके देवी की पूजा को किया जाता है. और यह पूजा भगत बड़े शौक और उत्साह के साथ करते हैं.

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